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RTI Act 2005: गलत या भ्रामक सूचना देने वाले PIO पर हो सकती है कार्रवाई, जानिए धारा 20 क्या कहती है..

नई दिल्ली/रायपुर। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 को भारतीय लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही का मजबूत आधार माना जाता है। यह कानून नागरिकों को सरकारी कार्यों, सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक निर्णयों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है। लेकिन यदि किसी आवेदक को जानबूझकर गलत, अधूरी या भ्रामक सूचना दी जाए, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर भी आघात माना जाता है।

अधिवक्ता डी.पी. जोशी

इसी विषय पर अधिवक्ता डी.पी. जोशी ने कहा कि सूचना का अधिकार तभी प्रभावी और सार्थक होगा, जब गलत या भ्रामक सूचना देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी। उन्होंने कहा कि पारदर्शी शासन की सबसे बड़ी पहचान सही और प्रमाणिक सूचना है, जबकि झूठी या गुमराह करने वाली जानकारी लोकतंत्र में जनता के विश्वास को कमजोर करती है।


PIO की क्या होती है जिम्मेदारी?

सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्रत्येक सरकारी विभाग में नियुक्त लोक सूचना अधिकारी (Public Information Officer – PIO) की जिम्मेदारी केवल सूचना उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि रिकॉर्ड के आधार पर सही, पूर्ण और समयबद्ध जानकारी देना भी है।

यदि कोई अधिकारी—

  • जानबूझकर गलत सूचना देता है,
  • अधूरी या भ्रामक जानकारी उपलब्ध कराता है,
  • रिकॉर्ड छिपाता है,
  • सूचना नष्ट करता है,
  • या सूचना देने में अनावश्यक बाधा उत्पन्न करता है,

तो वह RTI Act की मूल भावना के विरुद्ध कार्य करता है।


RTI Act की धारा 20 में क्या है प्रावधान?

अधिवक्ता डी.पी. जोशी के अनुसार, सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के तहत यदि सूचना आयोग यह पाता है कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना उचित कारण सूचना देने से इनकार किया, समय पर सूचना नहीं दी या जानबूझकर गलत एवं भ्रामक सूचना दी है, तो उस पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।

इसके अलावा धारा 20(2) के अंतर्गत संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की भी अनुशंसा की जा सकती है।


हर गलती पर नहीं लगता जुर्माना

कानून यह भी स्पष्ट करता है कि प्रत्येक त्रुटि दंडनीय नहीं होती। दंड तभी लगाया जाता है, जब यह प्रमाणित हो कि अधिकारी ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से, जानबूझकर या उपलब्ध अभिलेखों के विपरीत सूचना दी है।

सूचना आयोग प्रत्येक मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड, तथ्यों और परिस्थितियों का स्वतंत्र परीक्षण करने के बाद ही कार्रवाई करता है।


सुप्रीम कोर्ट ने भी माना RTI को लोकतंत्र की ताकत

अधिवक्ता डी.पी. जोशी ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण फैसलों में सूचना के अधिकार को लोकतंत्र की आधारशिला माना है।

  • State of Uttar Pradesh vs Raj Narain (1975) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनता को शासन की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।
  • S.P. Gupta vs Union of India (1981) में न्यायालय ने कहा कि लोकतांत्रिक शासन में पारदर्शिता नियम होनी चाहिए, गोपनीयता नहीं।
  • CBSE vs Aditya Bandopadhyay (2011) में कोर्ट ने पारदर्शिता और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन बनाए रखने की बात कही।
  • Manohar vs State of Maharashtra (2012) में सूचना आयोगों को दंडात्मक प्रावधानों का प्रभावी उपयोग करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

गलत सूचना से कमजोर पड़ता है लोकतंत्र

विशेषज्ञों का मानना है कि कई मामलों में नागरिकों को विषय से असंबंधित, अधूरी या गोलमोल जानकारी देकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। कई बार रिकॉर्ड मौजूद होने के बावजूद “सूचना उपलब्ध नहीं है” कहकर मामला टाल दिया जाता है।

ऐसी प्रवृत्तियां न केवल नागरिकों के अधिकारों का हनन करती हैं बल्कि पूरे सूचना तंत्र की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती हैं।


नागरिक क्या करें यदि सूचना गलत मिले?

यदि किसी आवेदक को लगता है कि उसे गलत या भ्रामक सूचना दी गई है, तो उसे—

  • प्रथम अपील,
  • द्वितीय अपील,
  • अथवा सूचना आयोग में शिकायत

दर्ज करनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार प्रमाण और दस्तावेजों के आधार पर की गई अपील अधिक प्रभावी होती है।


अधिवक्ता डी.पी. जोशी का मत

अधिवक्ता डी.पी. जोशी का कहना है कि लोकतंत्र में सरकार और जनता के बीच विश्वास का आधार सत्य, प्रमाणिक और पारदर्शी सूचना है। इसलिए ईमानदार लोक सूचना अधिकारियों को संरक्षण मिलना चाहिए, जबकि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध RTI Act की धारा 20 के तहत निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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