छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ ने खोया अपनी संस्कृति का अनमोल रत्न, तीजन बाई का निधन

रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्व मंच पर पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण से सम्मानित प्रख्यात पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित एम्स में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 70 वर्ष की थीं। उनके निधन से लोककला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

डॉ. तीजन बाई पिछले कई सप्ताह से रायपुर एम्स में भर्ती थीं। रविवार सुबह करीब 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि अस्पताल प्रशासन ने की।

संघर्ष से शिखर तक का प्रेरणादायी सफर

24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने बेहद साधारण परिवार से निकलकर अपनी प्रतिभा के दम पर पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी का परचम लहराया। उन्होंने महाभारत की कथाओं को अपनी अनूठी कापालिक शैली, दमदार अभिनय और प्रभावशाली गायन के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया।

देश-दुनिया में दिलाई पंडवानी को पहचान

तीजन बाई ने इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, जापान, तुर्की, मॉरीशस समेत कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर भारतीय लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई। उनकी कला ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया।

मिले अनेक प्रतिष्ठित सम्मान

लोककला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

प्रधानमंत्री सहित देशभर ने दी श्रद्धांजलि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित अनेक नेताओं, कलाकारों और सांस्कृतिक हस्तियों ने तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। सभी ने उन्हें भारतीय लोककला की अमूल्य धरोहर बताते हुए कहा कि उनका योगदान सदैव याद रखा जाएगा।

हमेशा अमर रहेगी उनकी विरासत

डॉ. तीजन बाई ने केवल पंडवानी का गायन नहीं किया, बल्कि उसे नई पहचान और नई पीढ़ी दी। उनका जीवन संघर्ष, साधना और समर्पण की ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों को प्रेरित करती रहेगी। उनके जाने से भले ही पंडवानी की एक बुलंद आवाज़ शांत हो गई हो, लेकिन उनकी कला और विरासत भारतीय लोकसंस्कृति में सदैव जीवित रहेगी।

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