हथियार छोड़ खेती को अपनाया: सुकमा के 25 आत्मसमर्पित युवाओं ने चुनी आत्मनिर्भरता की राह

रायपुर । छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले से पुनर्वास और आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक कहानी सामने आई है। कभी हथियार उठाने वाले 25 आत्मसमर्पित युवाओं ने अब खेती, पशुपालन और कृषि आधारित स्वरोजगार को अपने भविष्य का आधार बनाने का संकल्प लिया है। जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) सुकमा और कृषि विभाग द्वारा आयोजित 15 दिवसीय विशेष कौशल विकास प्रशिक्षण ने इन युवाओं को नई दिशा और नया आत्मविश्वास दिया है।
प्राकृतिक खेती और आधुनिक कृषि तकनीकों का मिला व्यावहारिक प्रशिक्षण
22 जून से 14 जुलाई 2026 तक आयोजित इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य आत्मसमर्पित युवाओं को स्थायी आजीविका से जोड़ना और उन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए प्रेरित करना था।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को प्राकृतिक खेती के साथ आधुनिक कृषि तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान दिया गया। युवाओं ने बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, हांडी दवा, थ्री-जी दवा और मछली टॉनिक तैयार करने की विधियां सीखीं। इसके अलावा नाडेप खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, सब्जी नर्सरी, धान की कतारबद्ध बुवाई, नीलहरित काई उत्पादन और कृषि यंत्रों के संचालन का भी प्रशिक्षण प्राप्त किया।
पशुपालन और कृषि आधारित व्यवसायों की मिली जानकारी
प्रशिक्षण केवल खेती तक सीमित नहीं रहा। युवाओं को बकरी पालन, मुर्गी पालन, ऑयस्टर मशरूम उत्पादन और मत्स्य पालन जैसे कृषि आधारित व्यवसायों की भी जानकारी दी गई, ताकि वे अपनी रुचि और संसाधनों के अनुसार स्वरोजगार शुरू कर सकें और नियमित आय का स्रोत विकसित कर सकें।
दंतेवाड़ा अध्ययन भ्रमण से मिला व्यावहारिक अनुभव
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को दंतेवाड़ा जिले का अध्ययन भ्रमण भी कराया गया। मैलावाड़ा में धान की एसआरआई पद्धति तथा भूमगादी में प्राकृतिक खेती की उन्नत तकनीकों का अवलोकन कर युवाओं ने आधुनिक कृषि पद्धतियों को खेतों में लागू करने का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया।
विशेषज्ञों ने बढ़ाया आत्मविश्वास
प्रशिक्षण के समापन समारोह में उप संचालक कृषि पी.आर. बघेल, सहायक संचालक कृषि सुधीर कुजूर तथा कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख एच.एस. तोमर सहित अन्य विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि खेती और कृषि आधारित उद्यम ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव हैं और इनके माध्यम से आत्मसमर्पित युवा आर्थिक रूप से सशक्त होकर सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं।
आत्मनिर्भर बनने का लिया संकल्प
प्रशिक्षण पूरा करने वाले युवाओं ने कहा कि वे अपने गांवों में सीखी गई तकनीकों का उपयोग कर खेती और कृषि आधारित स्वरोजगार शुरू करेंगे। उनका लक्ष्य आत्मनिर्भर बनकर समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक जीवन जीना है।
पुनर्वास की मिसाल बना सुकमा मॉडल
सुकमा का यह कौशल विकास प्रशिक्षण केवल रोजगार उपलब्ध कराने की पहल नहीं, बल्कि उन युवाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बना है जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन की राह चुनी है। यह पहल पुनर्वास, सामाजिक समावेशन और ग्रामीण विकास का एक प्रभावी मॉडल बनकर उभर रही है।


